Wednesday, 28 May 2014

मंजिल तक नहीं जाता …

कुछ बाते है ऐसी,
जो लबो पे नहीं आती,
महसूस होती है कमी हर पल,
पर शिकायत हो नहीं
बस एक ही आरजू है मेरे दिल की,
जो आज भी खुदा तक नहीं जति…

सांसो का चलना पहले भी था,
सोयी रात मैं जगना पहले भी था,
रंगो का उड़ना पलको से,
सपनो का साथ छोड़ना अरमानों से,
अपनी बदनामी का चर्चा,
तो पहले भी था,

कुछ वहम है ऐसा,
जो नज़रोंसे नहीं जाता,
महसूस होता है होश हर रोज ,
पर ये बेहोशीयो का पल नहीं जाता,
बस एक ही रास्ता नापा हैं मेरे दिल ने,
जो आज भी मंजिल तक नहीं जाता …
जो आज भी मंजिल तक नहीं जाता … 

Monday, 26 May 2014

बीती रात की याद...

बीती रात की याद मत दिलाओ यारों,
बस कुछ ऐसी गुजारी हैं,
के अब नींद भी नहीं आती,
और ये जान भी नहीं जाती …

सांसो का सजना पलको पे,
क्या कभी देखा है यारों,
आँसुओ का हसना होटो पे,
क्या कभी सुना है यारों,
खुद का होके भी खुद का ना होना,
सब कुछ होके भी सब खो देना,
क्या ऐसा पल कभी जिया है यारों …

उन लम्हों की याद मत दिलाओ यारों,
बस कुछ ऐसी गुजारी हैं,
के अब नींद भी नहीं आती,
और ये जान भी नहीं जाती …

दूरिया होक भी पास होना,
होश मैं होक भी बेहोश होना,
खयालो को लेके खयालो तक जाना,
मंजिलो से मिलने मंजिल को ले जाना,
ऐसा कभी सोचा है यारों,

बिखरे कुछ सपनो की याद मत दिलाओ यारों,
के अब नींद भी नहीं आती,
और ओ ख्वाब भी नहीं जाते  …


अब किस किस को सुनए,
और किस किस को रुलाये,
अपने हिस्से का जो गम है,
क्यों औरो को जताये,

उन रास्तो की याद मत दिलाओ यारों,
के अब चल भी नहीं पाते,
और छोड़े भी नहीं जाते …


बीती रात की याद मत दिलाओ यारों,
बस कुछ ऐसी गुजारी हैं,
के अब नींद भी नहीं आती,
और ये जान भी नहीं जाती …

किसी एक का तो साथ निभाते तो अच्छा होता …

जो बचा है होश थोड़ा ,
उसे खो जाने दो,
जो बची है सांसे थोड़ी,
उसे छूट जाने दो,
क़यामत तो आयेगी आज नही तो कल तो,
तब ही सही,
अपना हिसाब हो जाने दो…


रब का वास्ता न देते तो अच्छा होता,
सहा है जिसने उसे याद करते तो अच्छा होता,
गम मैं हाथ छोड़ने की आदत तो पुरानी है आपकी,
किसी एक का तो साथ निभाते तो अच्छा होता … 

Thursday, 8 May 2014

न भांडता एक दिवस...देवाशी बोलायचंय!

चालत चालत रस्ता,
कुठे तरी थांबायचंय,
न भांडता एक दिवस,
देवाशी बोलायचंय….

रमून खूप झालं,
हसून खूप झालं,
पळून खूप झालं,
दमून खूप झालं,
आता कुठे तरी थांबायचंय,
चालत चालत रस्ता,
एकदा तरी आस्तित्व शोधायचंय …


पावसाची सर वाहून कधीच गेली,
मातीचा गंध हरपून कधीच गेला,
चंद्राची कोर,
बैल गाढीची ओढ,
संपून कधीच गेली!

रडून ही खूप झालं,
चिडून ही खूप झालं,
चुकून ही खूप झालं,
मरून ही खूप झालं,
आता कुठे तरी थांबायचंय,
चालत चालत रस्ता,
एकदा तरी स्वतःला शोधायचंय …


पैक्याशी मैत्री जेव्हा झाली,
नात्यांची ओढ तेव्हाच गेली,
पापाशी दोस्ती जमली जेव्हा,
देवाशी गट्टी झालीच तेव्हा,

कमावून ही खूप झालं,
दाखवून ही खूप झालं,
एकटपण खूप झालं,
अन हारणं ही खूप झालं…
आता कुठे तरी थांबायचंय,
चालत चालत रस्ता,
एकदा तरी स्वतःला शोधायचंय …

चालत चालत रस्ता,
कुठे तरी थांबायचंय,
न भांडता एक दिवस,
देवाशी बोलायचंय….