Tuesday, 24 December 2013

बेटी मेरी …

बेटी मेरी …

हसती है हसाती है,
रोती है रुलाती है,
बिखरती है साम्भालती है,
बचकाने काम करती है,
पर जो भी है,
मां का दर्द समझाती है और पापा से प्यार करती है…

बेटी मेरी … 
सिखती है सिखाती है,
ठूकराती है अपनाती है,
गिरती है गीराती है,
गीराके फिर उठाती है,
पर जो भी है,
लता के गीत गाती है और सचिन से प्यार करती है,

बेटी मेरी …
हर एक के मन को भाती है,
हर एक सपना जगाती है,
पत्ते के महल बनाती है,
बनाके और सजाती है,
पर जो भी है,
दुनिया का दर्द समजती है और इंसान से प्यार करती है…

बेटी मेरी …
अब…
रुसवा है खामोश है,
और जान के भी अनजान है,
नये रासते है मंजिले है,
और बाकी भी कई अरमान है,
पाना है छूट जाणा है,
और रिश्ते को भी भुलाना है,
पर जो भी है,
मां का दर्द समझाती है और पापा से प्यार करती है…
 

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