Tuesday, 24 December 2013

जीते मरते रहते युही , खामखा जान डालना जरुरी तो ना था ...

जीते मरते रहते युही हम, 
खामखा जान डालना जरुरी तो ना था ...

उजड़ी हुई बस्ती में चिराग जलाना जरूरी तो ना था 
बुझते हुये ख्वाबो को जन्नत दिखाना जरुरी तो ना था 
जीते मरते रहते युही हम 
खामखा जान डालना जरुरी तो ना था 

बोल तो तुम थे, 
शायर हम बन गए, 
सफ़र तो तुम थे,
मंजिल हम बन गए,
सहेर तो तुम थे,
चाँद हम बन गए,
पैमाने तो तुम थे,
और मैफिल हम बन गए ..

ज़हर का घोट पी भी लेते हम ,
और हर दर्द को जी लेते हम ,
इश्क की बला सह भी लेते हम ,
और कभी कभी ,
आंसू रेत पे गिरने देते हम ,
जीते मरते रहते युही,
खामखा जान डालना जरुरी तो ना था ...

असर तुम्हारा ही था,
जो आज भी साँस लेता हूँ ,
मेहर तुम्हारा ही था,
जो आज भी गीत गाता हूँ ,
दुवा तुम्हारी ही थी,
जो आज भी प्यार पाता हूँ ,
चाहते तुम्हारी ही थी शायद,
जो याद तुम्हे ही करता हूँ ...

पैदायशी बदनाम जी लेते हम ,
कब्र की ख़ामोशी सह लेते हम ,
जीते मरते रहते युही ,
खामखा जान डालना जरुरी तो ना था ...

आगाज तो तुमने किया,
अब अंजाम हम बन जायेंगे ,
इश्क तो तुमने भी किया,
अब मिसाल हम बन जायेंगे,
रास्ता तो तुमने किया,
अब मंजिल हम बन जायेंगे ,
इबादत तो तुमने भी की ,
पर खुदा हम बन जायेंगे ...

बिघडे हुए रावन में राम जगाना जरूरी तो ना था ,
बुझते हुये सपनोको को प्यार दिखाना जरुरी तो ना था,
जीते मरते रहते युही हम ,
खामखा जान डालना जरुरी तो ना था ....

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